ख्वाहिशें

ख्वाहिशों का क्षितिज असीम है |

कल्पनाओँ का विराट सैलाब है ||

कभी , अनकही अधूरी ख्वाहिशों का जाल |

तो कभी , गवाक्ष खोल उडान भरती हसरतो का अंदाज ||

कभी ,नव जीवन सृजन की पल्लवित अभिलाषाएँ |

तो कभी ,मानवता के ध्वँस को उन्मुख ख्वाहिशें|

कभी ,अभीष्ट पर कुर्बान होने की तमन्ना |

तो कभी ,अन्तः ज्वाला से तपित दग्ध कामना ||

कभी ,प्रणय रागिनी की अलौकिक धारा से स्पंदित अभिलाष |

तो कभी ,चिर विरही मिलन की आकुल तृषा||

कभी ,काल्पनिक स्वर्ग की ख्वाहिश |

तो कभी ,मन के खंडहर की प्रदक्षिणा की गुज़ारिश||

कभी ,शून्य से शिखर तक उत्थान की कामना |

तो कभी ,धूमिल स्वप्न पतन की कंपित आशंका ||

कभी ,अति सूक्ष्म निराकार निर्मल आनंदित ख्वाहिशें |

तो कभी ,बंधन विहीन विहंगम फरमाइशें ||

कभी ,शैशव के सपने.व् मदमाते यौवन की ख्वाहिशें |

तो कभी ,कर्तव्य कर्म से बंधन मुक्त होने की हसरते ||

कभी ,मृगतृष्णा से भ्रमित संचित आकांक्षाये |

तो कभी ,कटु सत्य से प्रेरित अभिलाषाएँ ||

आरम्भ बिंदु है ख्वाहिशों का ,

मनुज के प्रथम खोलते लोचन मे|

और हुलसती है ,प्राणहंत होने तक ||

ख्वाहिशे चिरन्तर आस की स्फुलिंग है |

इसलिए, ख्वाहिशों का क्षितिज असीम है ||

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जरा सा हौसला होता तो

जरा सा हौसला होता तो ,तूफ़ां से गुजर जाते |

जीने का सहारा होता तो ,हद से गुजर जाते ||

हमसफ़र का साथ होता तो, जिंदगी मे कई रंग भर जाते

तिनके का सहारा होता तो , दरिया जिंदगी का पार कर जाते ||

असर गर होता अल्फ़ाजों मे तो , महफ़िल को कायल कर जाते |

वक्त गर सख्त न होता तो , उल्फत की सरहद पार कर जाते ||

काफिले बहारो के रूठे न होते तो, रुपहले अरमान मंजिल पा जाते ||

रिश्ते गर पुख्ता होते तो , मकाँ घरोंदे मे तब्दील हो जाते

अधूरी किस्मत का सितारा गर बुलंद होता तो, वस्ल की सूरत मिल जाती ||

गर रहगुज़र सूनी ना होती तो, मंजिल आसां हो गयी होती

रुबाई गर रूठी ना होती तो ,दिलकश ग़ज़ल बन गयी होती ||

दिल के वीराने पर नजरें करम होता तो ,मेहताब आगोश मे होता ||

पलके झुका ना ली होती तो, खवाबो की ताबीर मुकम्मल हो जाती ||

गर सहर ना होती तो ,इंतजार को मंजिल मिल जाती ||

गर दिल के हर्फ़ पर नाम लिख लिया होता तो , सिरते इश्क से वाकिफ हो गए होते ||

बहुत दूर तलक

बहुत दूर तलक आ गए हम ,

बहुत पीछे कही छूट गए तुम |

कारवां बढ़ चला मंजिल की ओर,

और हम यादो को दफ़न कर आये कब्र मे ||

बहुत दूर तलक आ गए हम ,

,बहुत पीछे कही छूट गए तुम |

दास्तां मुक्त हो गयी अपने अंजाम से ,

और हम ताबीर मिटा आये चंद लम्हो की इबारत से

बहुत दूर तलक आ गए हम ,

,बहुत पीछे कही छूट गए तुम |

अंदाजे बयां बदल दिया बाअदब अल्फाज से

और तब्दील होगये मुख़्तसर अपने आप से ||

बहुत दूर तलक आ गए हम ,

,बहुत पीछे कही छूट गए तुम |

कांधो पर ढोना छोड़ दिया रिश्तो के बोझ को

और वजूद को सिमटा लिया अपने ही खोल मे ||

, बहुत दूर तलक आ गए हम

बहुत पीछे कही छूट गए तुम |

खलिश से दामन छुड़ा लिया जुबां ने

और संवारना छोड़ दिया काँटों सजे गुलो को गुलशन मे

बहुत दूर तलक आ गए हम ,

,बहुत पीछे कही छूट गए तुम |

एहसास शिद्दत तर कर गयी दामन को ,

और दस्ताने गम को दरबदर कर आये दिले आशियाँ से |

बहुत दूर तलक आ गए हम ,

,बहुत पीछे कही छूट गए तुम |

रंग ए महफ़िल सज गयी रंग महल मे ,

और लबो पर ,तरनुम छेड़ आये पैगामे जिंदगी के ||

बहुत दूर तलक आ गए हम ,

,बहुत पीछे कही छूट गए तुम |

फासले मिट गए दरमियाने मेहताबो के

और हम तो मुक्त हो गए सरहदों के जाल से

बहुत दूर तलक आ गए हम ,

,बहुत पीछे कही छूट गए तुम |

कभी फुर्सत हो तो

कभी फुर्सत हो तो गुजरना उन पुरानी गलियों से ,

शायद मिल जाये चिर -विरही कोई बेहद अपना ||

कभी फुर्सत हो तो पलटना समय चक्र को ,

शायद विलुकित दृग को मिल जाये पल कोई सुनहरा ||

कभी फुर्सत हो तो सुनना दस्तक मन की पगडण्डी पर ,

शायद सुनाई दे उन कदमो की आहट जिनके निशाँ अब तलक उकरे हुए है ||

कभी फुर्सत हो तो ढ़ूढ़ना दिल के आईने मे,

शायद अब भी एक अक्स नज़र आये किसी सःह्रदये का ||

कभी फुर्सत हो तो उलटना पुरानी किताब के पन्नो को ,

शायद मिल जाये सूखा एक गुलाब जो दिया किसी स्नेहमयी ने ||

कभी फुर्सत हो तो झांकना यादो के गलियारे में ,

शायद स्मृति दीप एक जल रहा हो किसी प्रेमपथ का ||

कभी फुर्सत हो तो खोलना गठरी बीते समय की ,

शायद महकता एक खत मिल जाये गुजरे अतीत का ||

फुर्सत हो तो टटोलना तमन्नाओ की फेहरिस्त को ,

शायद शिकवा कोई जुबां पर आ जाये किसी की बेवफ़ाई का ||

फुर्सत हो तो करना तलाश उजड़े स्वप्निल आशियाने की

शायद मिल जाये दबी कोई नक्काशित ईंट दो से हुए एक नाम की ||

मै बिखर बिखर जाता हूँ

मै बिखर बिखर जाता हूँ|

तुम सिमट जाओ , मै बिखर बिखर जाता हूँ|

तुम संवर जाओ, मैं मिट मिट जाता हूँ ||

तुम उजाले मे रहो , मैं अंधेरो मे गुम हो जाता हूँ |

तुम मगरूर रकीब हो जाओं , मैं मजबूर हबीब हो जाता हूँ ||

तुम नजरें रोशन रहो , मैं बेनजऱ हो जाता हूँ |

तुम सुकूने आबाद रहो , मैं बर्बादे जहां हुआ जाता हूँ

||

तुम ताजदार रहो , मैं खाकसार हुआ जाता हूँ |

तुम राहते आशियाँ रहो , मैं दरबदर हुआ जाता हूँ ||

तुम मैं के गुरुर मे रहो , मैं हम की तफसील मे खो जाता हूँ ||

तुम मंजिले चाहत पा जाओ, मैं गर्दिशे तूफ़ां से गुजर जाता हूँ |

तुम राहते हयात रहो , मैं फिक्र का सूरज रोशन किये जाता हूँ ||

तुम नजरें कायनात रहो, मैं बेदर्द निगाहो का निशाना हो जाता हूँ |

तुम शायरे ग़ज़ल बन जाओ, मैं नज़म उलझी बन जाता हूँ ||

तुम बेवफाई से दामन तर रहो , मैं शर्त ऐ वफ़ा निबाह जाता हूँ |

तुम कहानी का अहम् किरदार हो जाओ , मैं अधकही कथा का सफर वीरान हो जाता हूँ ||

क्षिति

शबनमी ओस की ,बून्द सी है बेटी |

गीली मिटटी की सौंधी ,खुशबु सी है बेटी ||

स्वप्न अंतरज्योति ,सी है बेटी |

रक्तिम रुखसार लिए ,फ़रिश्ते सा नूर सी है बेटी ||

लरजते लबो पर ,मदहोशी तब्बसुम सी है बेटी |

प्रतीक्षारत लम्हों पर ,ठंडी बयार सी है बेटी ||

तपती धुप मे ,शीतल एहसास सी है बेटी |

सुनहरे क्षितिज पर ,शुभ्र धवल चांदनी सी है बेटी ||

पायल के घुंगरू की ,सरगम सी है बेटी |

बाबुल के काँधे पर ,अठखेलियों सी है बेटी ||

माँ की सुरीली ,लोरी सी है बेटी |

चिर तन्मय ,ईशवंदना सी है बेटी ||

मुस्कराती प्राची मे ,उषा की किरण सी है बेटी |

सीप मे बंद मोती ,सी अनमोल है बेटी ||

दुआओ की ,तामील की नैमत है बेटी |

सर्व सुख की ,सम्भावना सी है बेटी ||

अक्षित का अंश , साक्षी के साक्ष्य सी है क्षिति ||

बादल

जो जलवाष्प कणो के संघनन से सृजित ,वो है बादल||

वसुधा सागर से उठते भार से निर्मित, वो है बादल |

छाया आकाश मे इठलाते चिंघाड़ते ,वो है बादल ||

नभ के अंतरतम मे अठखेलिया करते ,वो है श्यामल बादल |

धरा पर मधुरतम सलिल कण झरते ,वो है निर्झर बादल||

नूपुर की भांति कलध्वनि से गुंजित करते, वो है बादल |

सारंगी की लय सी अनहद बुँदे के रूप मे सरगम गाते, वो है मतवाले बादल ||

अम्बर के नीले फर्श पर धवल रुई के मोहक गोले, वो है बादल |

घन के उर से शुभ्र सुनहरी धार बरसाते, वो है निर्मल बादल ||

उर्वर जीवन के आस केंद्र बिंदु ,वो है स्पर्शमणि वारिद |

उत्कंठित आशा से निहारते अपलक नेत्रों की ज्योति ,वो है आलोकित बादल ||

इन्द्र पदचाप के धोतक ,वो है कजरारे काले बादल |

वर्षा ऋतू की अगुवाई के सन्देश वाहक, वो है श्याम घन||

घुमड़ घुमड़ कर निशब्द इंतजार के अंत का पैगाम देता ,वो है घनेरे बादल |||

परितापित धरा को तृप्त करने हेतु अस्तित्व विलीन होने वाला ,वो है जीवन दीप बादल ||

रेशमी आलम मे नूर की बूंदो का नजराना अदा फरमाने वाला ,वो है स्वनिल बादल |

अनंत अम्बर के रंगमंच पर परदे के पीछे व्यूह रचना करते ,चितेरे बादल |

क्षितिज और वसुधा के चिप्रतीक्षित आंशिक प्रणय मिलन के स्रोतरस्विनी, वो है स्नेहदूत जलद यानि बादल

प्रथम शिल्पकार

माना ,आप चिरनिद्रा मे लीन हो गए हो |

आप अनंत समाधी मे अन्तर्लीन हो गए हो ||

माना ,हमारी दृष्टि से अलोप हो गए हो |

पर हमारे हृदय दर्पण मे सचित्र मज्जजित हो गए हो ||

माना ,कि हमसे बहुत दूर चले गए हो |

पर अब तो और पास हो गए हो ||

क्योकि ,अब हमारी रुह में समां गए हो |

वैसे भी हम आपके वजूद का ही हिस्सा है ||

पर अब तो आपकी अलौकिक स्वरूप के अनुगामी हो गए है |

आप तो चिर निद्रा मे लीन हो गए हो ||

पर ,हमें चिररंतन ज्योति से ज्योतिर्मय कर गए हो |

आप तो हमारे ह्रदय कलिका मे चिर संचित हो गए हो ||

आप हमारे स्वमानस मे स्वर्णांकित हो गए हो |

आप प्रत्यक्ष मे अनुपस्तिथ होकर भी हमारे अंतर्मन मे अपरोक्ष स्थापित हो गए हो ||

आप हमारे जीवन सफर के मील पत्थर बन गए हो |

आप हमें अध्यात्म की अलौकिक धारा का मर्म समझा गए हो ||

आप हमारे चरित्र चित्रण के दिशा निर्धारक छायाकार बन गए हो |

आप हमारेजीवन गाथा की अंतर्नाद दिव्य चेतना के रूप मे प्रज्जवलित हो गए हो ||

मुझ क्षणिक पाषाण प्रतिमा के संस्कार सृजक शिल्पकार बन गए हो |

मेरे पथप्रदर्शक ,प्रेरणादायक ,ज्योतिर्मय दिव्ये शक्ति को शत शत प्रणाम ||

Poem featured in Indian Periodical- बेकिरदार

मुझे ये बताते हुए बेहद ख़ुशी मिल रही है की मेरी कविता ‘ इंडियन पेरिओडिकल में प्रदर्शित हुई है ।मै आप सब के साथ ये लिंक शेयर कर रही हूँ।

आपके विचार जान ने के लिए बेसब् |

http://indianperiodical.com/2018/07/बेकिरदार/

महा गाथा !

जीवन एक सपूर्ण ग्रन्थ के है मानिंद ,

जिसके हर पृष्ठ पर अंकित है ,महा गाथा |

रंगों और छंदो के ,वैभव से परिपूर्णहै गाथा |

अखंड विश्वास और होसले की ,अलौकिक है यात्रा |

जाग्रत और सुप्त स्वप्नों की ,सूंदर है इबारत |

युगान्तर की प्रदक्षिणा करती है ,गाथा |

अतीत और वर्तमान की है ,सांझी कथा |

कर्ज और फर्ज का है ,संधि प्रस्ताव |

कालचक्र की कश्मकश का है ,गवाहगान |

आगत भविष्य का है ,आहट नाद |

स्वअंतर्नाद की है ,महाचेतना |

नकारात्मक और सकारात्मक विचारो की है ,मेखला |

वयस के निरन्तर उतार चढाव की है ,कसमसाहट |

अक्षुण प्राप्ति और प्राप्य की है ,जिजीविषा |

योग और वियोग की है ,असंग यात्रा |

कर्तव्ये और अधिकारों की है ,विद्रोह यात्रा |

भावनाओ और सम्भावनाओ की है ,स्पर्धा गाथा |नैतिक और मौलिक दायित्वो की है ,निर्वाह यात्रा |

शास्वत सत्ये और मिथहास की है ,पूर्ण गाथा |

जीवन एक सपूर्ण ग्रन्थ. के है ,मानिंद |

जिसके हर पृष्ठ पर अंकित है ,महा गाथा |

अंकित हर हर्फ़ है ,आत्मसाक्षात्कार की महागाथ|