Poem featured in Indian periodical – शब्द-जब-झरे-लेखनी-से!

मुझे ये बताते हुए बेहद ख़ुशी मिल रही है की मेरी कविता ‘ इंडियन पेरिओडिकल में प्रदर्शित हुई है ।मै आप सब के साथ ये लिंक शेयर कर रही हूँ।

आपके विचार जान ने के लिए बेसब् |

http://indianperiodical.com/2018/05/शब्द-जब-झरे-लेखनी-से/

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शब्दों का खेल !

शब्दों का खेल है ,ये सारा |

शब्द मौन होकर भी ,व्यक्त हो जाते है ||

शब्द ज़ज्बात की ,तासीर बदल देते है |

शब्द रुदन की ,वजह होते है ||

तो शब्द ख़ुशी का ,आधार भी होते है |

शब्द गर्त में ,धकेलने वाले भी होते है ||

तो शब्द ऊंचाई पर ,पहुंचने की सीढी भी होते है |

शब्द ही ,रिश्तो को बेनूर करते है ||

तो शब्द ही बंधन को ,मजबूत भी करते है |

शब्द ही ,बदनीयती को दर्शाते है ||

तो शब्द ही ,शराफत का पैहरण भी होते है |

शब्द बेबसी को ,बयां करते है ||

तो शब्द ही ,दिलो मे वीरत्व की हुंकार भरते है |

शब्द ही से ,अतीत रक्तरंजित हुआ है ||

तो शब्दों से ही ,इतिहास के नए सफ़े लिखे जाते है |

शब्दों का ,खेल बड़ा निरालाहै ||

शब्दों का संसार ,कलम की तेज धार से लिखा जाता है |

शब्दों से ही ,कागज का श्रृंगार होता है ||

शब्दों से ही ,जीवन का शुभांरभ होता है |

और शशक्त शब्दों के दवारा ही ,जीवन का समापन करना है ||

Poem featured in indian periodical

मुझे ये बताते हुए बेहद ख़ुशी मिल रही है की मेरी कविता ‘ इंडियन पेरिओडिकल में प्रदर्शित हुई है ।मै आप सब के साथ ये लिंक शेयर कर रही हूँ।

आपके विचार जान ने के लिए बेसब् |

http://indianperiodical.com/2018/05/प्रगति-गान/

हौसला-ए-बुलंद !

हौसला अगर करले ,तो जीत निश्चित है |

जूनून जीतने का हो ,तो मंजिल को पाना निश्चित है |

नयी राहों का निर्माण करले ,तो सफर आसान है |

आत्मनियत्रण पक्का है ,तो पाषाण का टूटना निश्चित है

अडिग विश्वास है ,तो दुरूहु इच्छाएं भी पूरी होती है |

उड़ान गर ऊंची करले ,तो सुनहरा क्षितिज मय्यसर है |

अटूट निष्ठां है ,तो तूफान की रफ़्तार का रुख बदल जाता है |

इरादा बुलंद है ,तो खवाबो को यथार्थ की जमीं मिलना निश्चित है|

कलम को गर शब्दों की धार दे ,तो श्रेष्ठ कृति की सरंचना निश्चित है |

सतत एकाग्रता है ,तो इम्तिहानो के दौर सहज ही गुजर जाते है |

ध्येय सच्चा है ,तो हिमखंड भी पिघल जाता है |

यकीं गर पुख्ता है ,तो अक्षय ज्योति अक्षय पुंज बन गहन अंधकार को मिटा देती है |

मनोबल गर ऊँचा है ,तो महत्वकांशा का मूर्त रूप में ढलना निश्चित है |

अपनों की निस्चल दुआएँ गर साथ हो ,तो हाथो की लक़ीरों का बदलना भी निश्चित है |

हौसला गर बुलंद हो ,तो नव स्वर्णोदय निश्चित है |

काश कभी तो कहा होता

काश कभी तो कहा होता ,

तुम मेरी हो सिर्फ मेरी हो,

मुझे जाते वक्त रोका तो होता |

हाथ थामकर जताया होता ,

तुम मेरी हो कहा तो होता |

मेरे बहते अश्को को सहेजा होता ,

रोने पर सभाला तो.होता ,

मेरे गम मे खुद को भी शामिल किया तो होता |

तुम्हारे हर गम का साझीदार हूँ कहा तो होता |

मेरे जख्म को रफू तो लगाया होता ,

नासूर बनने से पहले ही मरहम तो लगाया होता ,

तुम्हारे हर जख्म की दवा हूँ मैं कहा तो होता |

जिंदगी की धुप.से झुलसने से बचाया तो होता |

बाहों की ठंडक से सिहराया तो होता ,

लबो की जुंबिश से कहा तो होता ,

मैं तुम्हारे लिए राहते जहाँ हूँ |

मेरे रूठ जाने पर मुझे मनाया तो होता ,

मुझे मनुहार से बहलाया तो होता |

मुझे दुलार कर कहा तो होता कि,

तेरे रूठने से मुझसे मेरी जिंदगी रूठ जाती है |

काश ये कहा तो होता ,

मेरे सम्मान को ठेस लगाते वक्त |

ग्लानि का अहसास किया तो होता ,

मुझे हिदायतों का पुलिंदा थमाया न होता |

एक बार अपनी भूल का गफ्फारा किया तो होता |

मेरे वजूद को तमाशा ए जहाँ बनाते वक्त,

हृदय पटल को टटोला तो होता ,

सही गलत के पैमाने को परखा तो होता |

काश एक बार कहा तो होता कि ,

तुम्हे कैफ़ियतों कि दरकार नहीं है |

मैं तुम्हारी पाकनीयती का कायल हूँ,

काश एक बार कहा तो होता ,

मुझे तुम पर यकीन ए गुमान है |

मैं तुम्हारी रूह का कतरा हूँ |

काश एक बार कहा तो होता ,

तुम मेरी हो सिर्फ मेरी |

Poem featured in indian periodical – बदलता-इतिहास

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Pratima Mehta

आईना !

आईना हूँ मैं , दर्पण ही हूँ मैं,

तेरी ही परछाई हूँ मैं |

मुझे न दर्द का पता ,ना वेदना का ठौर ,

फिर भी तेरे दर्द का हमदर्द हूँ मैं |

मेरा ना कोई रूप, ना कई स्वरुप ,

फिर भी तेरे रूप का चित्रकार हूँ मैं |

मै ना मिथ्या हूँ ,ना ही कोई छलावा,

फिर भी तेरे अक्स का अक्सकार हूँ मैं |

मै ना ओट हूँ ,ना ही कोई पर्दा ,

फिर भी तेरे गुणों अवगुणो का पनाहकार हूँ मैं |

मै ना दिग्भ्रमित हूँ ,ना ही कोई भ्रमजाल ,

फिर भी तुम्हारे  रूप का शाहकार हूँ मैं |

मै ना कल्पना हूँ ,नहीं कोई मरीचिका ,

फिर भी  तेरे तस्सव्वुर का समीक्षाकार हूँ मैं |

मै ना कोई फरेब हूँ ,ना ही कोई धोखा,

तुम्हारी  छवि का यथार्थकार हूँ मैं |

आईना हूँ मैं ,दर्पण ही हूँ ,

तुम्हारे ही प्रतिबिम्ब का रूबरू कार हूँ मैं|

थक चुकी हूँ मै |

जीवन की आपाधापी से ,

भागदौड़ भरी जिंदगी से ,

थक चुकी हूँ मै |

रुक सी गयी हूँ मैं |

जीवन के उत्तर चढाव से ,

सवालों के सैलाब से ,

थक चुकी हूँ मैं |

रुक सी गयी हूँ मैं |

जिंदगी की आजमाईश से ,

मखौल उड़ाते रिश्तो से ,

थक चुकी हूँ मैं |

रुक सी गयी हूँ मैं |

जिंदगी मैं शामिल शिकवों से ,

शिकायतों की तफ्सील बताने से ,

थक चुकी हूँ मैं |

रुक सी गयी हूँ मैं |

ज़माने के इनायतेँ जख्मो से ,

जख्मो को निगाहो से छुपाने से ,

थक चुकी हूँ मैं |

रुक सी गयी हूँ मैं |

जिंदगी की कशमकश से ,

लड़ कर संभलते संभलते,

थक गयी हूँ मैं |

रुक सी गयी हूँ मैं |

कठिन इम्तिहानो के दौर से ,

नाकामयाबी के डर से ,

थक चुकी हूँ मैं |

रुक सी गयी हूँ मैं |

जिंदगी की कसौटी से ,

अपने आपको परखते परखते ,

थक चुकी हूँ मैं |

रुक सी गयी हूँ मैं |

Poem featured in indian periodical – निज़ाम दुनिया का

मुझे ये बताते हुए बेहद ख़ुशी मिल रही है की मेरी कविता ‘निज़ाम दुनिया का’, इंडियन पेरिओडिकल में प्रदर्शित हुई है ।मै आप सब के साथ ये लिंक शेयर कर रही हूँ।

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सितमगर कोई अपना !


दस्तक दर दस्तक देता है कोई , 

गुम हो जाता है फिर सामने आ जाता है कोई ,

आँख मिचोली का खेल खेलजता है फिर कोई अपना |

जख्म दर जख्म दे जाता है कोई ,

घाव पर मरहम लगाता है कोई ,

टीस को बढ़ा जाता है फिर कोई अपना |

हर्फ़ दर हर्फ़ लिख जाता है कोई ,

फ़साने को कहानी बना जाता है कोई ,

फलसफे को दर्द भरी दास्ताँ बना देता है कोई अपना |

हफ्ता दर हफ्ता आ जाता है कोई ,

दर्श का दीदार करा जाता है कोई ,

जुदाई को नसीब बना देता है फिर कोई अपना |

हक़ दर हक़ जताता है कोई ,

अपना होने का एहसास दिलाता है कोई ,

महरूमियत का ताज पहना जाता है फिर कोई अपना|

वफ़ा दर वफ़ा निभाता है कोई ,

इस कदर विश्वास बंधाता है कोई ,

बेवफाई कर जाता है फिर कोई अपना |

कदम दर कदम मिलता है कोई ,

दूर तलक साथ चलता है कोई ,

पथ भ्रमित कर देता है फिर कोइ अपना |

अश्क दर अश्क बहता है कोई ,

दर्द को पहचानता है कोई ,

शिद्दते गम को हवा देता है फिर कोई अपना |

जिंदगी दर जिंदगी बनाता है कोई ,

जीने का करतब सिखात्ता है कोई ,

छिन्न भिन्न सांसे कर जाता है फिर कोई अपना |

जमी दर जमी मय्यसर कर देता है कोई ,

आसमां को सर पर सजा देता है कोई,

कदमो तले जमीं खींच लेता है फिर कोई अपना |